images 17.jpeg

एक ऐसी माता , देवी जिन्हें लगाया जाता है वासी भोजन का भोग, आइए जानते हैं इनसे जुडी कथाएं, व्रत

माता शीतला की कहानी एक प्रसिद्ध हिन्दू लोककथा है जो शीतला अष्टमी के व्रत से जुड़ी है। यह कथा शीतला माता के महत्व और बासी भोजन के साथ उनकी पूजा के पीछे के कारणों को दर्शाती है।


संपूर्ण कथा


एक गांव में एक ब्राह्मण परिवार रहता था, जिसमें एक बुजुर्ग दंपत्ति, उनके दो बेटे और दो बहुएं थीं। दोनों बहुओं के अपने-अपने दो बेटे थे। शीतला अष्टमी के दिन, सास ने दोनों बहुओं को पूरे विधि-विधान से माता शीतला का व्रत रखने को कहा।
शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का सेवन करना होता है, इसलिए एक दिन पहले ही भोजन बनाकर रख लिया गया था। दोनों बहुओं को डर था कि बासी भोजन खाने से उनके बच्चों की तबीयत खराब हो जाएगी, इसलिए उन्होंने ताजा भोजन बनाया।
जब सास को इस बारे में पता चला तो उसने नाराजगी जाहिर की। कुछ समय बाद, दोनों बहुओं के बच्चों की मृत्यु हो गई। सास ने दोनों बहुओं को घर से निकाल दिया।
दोनों बहुएं अपने बच्चों के शवों को लेकर जा रही थीं, रास्ते में उन्हें शीतला और ओरी नाम की दो बहनें मिलीं, जो जूँओं से परेशान थीं। बहुओं ने उनकी मदद की और उनके सिर साफ किए। शीतला और ओरी ने बहुओं को आशीर्वाद दिया, लेकिन बहुओं ने अपने बच्चों के शव दिखाए।
शीतला ने बहुओं को बताया कि उन्हें अपने कर्मों का फल मिला है, और बासी भोजन न खाने के कारण ऐसा हुआ है। बहुओं ने माता शीतला से माफी मांगी और आगे से ऐसा न करने का वादा किया। माता शीतला ने दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया।
इस घटना के बाद, पूरे गांव में शीतला माता का व्रत धूमधाम से मनाया जाने लगा, और माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा शुरू हो गई, यह जानकारी नवभारत टाइम्स से ली गई है।


शीतला माता का महत्व:


शीतला माता को चेचक, खसरा और त्वचा रोगों से बचाने वाली देवी माना जाता है। शीतला अष्टमी के दिन, भक्त माता शीतला की पूजा करते हैं और उनसे अपने परिवार के स्वास्थ्य, शांति और रोगमुक्ति की प्रार्थना करते हैं।


शीतला अष्टमी का व्रत:


शीतला अष्टमी के दिन, भक्त बासी भोजन का सेवन करते हैं, जिसे बसौड़ा भी कहा जाता है। यह मान्यता है कि इस दिन पकाया गया भोजन खाने से बीमारियाँ नहीं होती हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि मां शीतला का यह रूप साफ-सफाई का महत्व दर्शाता है। माता के इस स्वरूप का मतलब है कि जो लोग साफ-सफाई से नहीं रहते हैं उन्हें कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है शीतला माता का वाहन गधा है.

शीतला माता की उत्पत्ति के संबंध में कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने अपने तेज से देवी शीतला की रचना की, जो हाथों में कलश, नीम के पत्ते और सूप धारण किए हुए थीं। ब्रह्मा ने उन्हें रोगों से मुक्ति दिलाने का कार्य सौंपा।


एक अन्य कथा में, शीतला माता को भगवान शिव के पसीने से उत्पन्न एक राक्षस के साथ पृथ्वी पर आने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है। जब शीतला माता और ज्वरासुर (राक्षस) धरती पर रहने के लिए जगह ढूंढ रहे थे, तो वे राजा विराट के दरबार में पहुंचे.


एक अन्य कथा के अनुसार, शीतला माता ने धरती पर यह देखने के लिए भ्रमण किया कि कौन उनकी सच्चे मन से पूजा करता है. जब एक गाँव में किसी ने उनके ऊपर उबलता पानी फेंक दिया, तो एक कुम्हारिन ने उनकी सेवा की और उन्हें ठंडक पहुंचाई. इस सेवा से प्रसन्न होकर, माता ने कुम्हारिन को आशीर्वाद दिया और उसके गाँव में शीतला माता की पूजा का महत्व बढ़ गया.

(Such a mother goddess who is offered the food of the residents, let’s know the stories and fasts related to her)

इन कथाओं में, शीतला माता को स्वच्छता और रोगों से मुक्ति की देवी के रूप में पूजा जाता है। शीतला माता की पूजा मुख्य रूप से शीतला अष्टमी के दिन की जाती है, जिसे बासौड़ा के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन, भक्त शीतला माता को ठंडे भोजन का भोग लगाते हैं और उनसे अपने और अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोगों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं.

माता शीतला सात बहन हैं- ऋणिका, घृर्णिका, महला, मंगला, शीतला, सेठला और दुर्गा। चैत्र कृष्ण अष्टमी से आषाढ़ कृष्ण अष्टमी तक होने वाले 90 दिन के व्रत को ही गौरी शीतला व्रत भी कहा जाता है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला देवी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होती है।

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top