Shaktipeeth – ज्वालामुखी, ज्वाला माता के बारे में जाने कुछ रोचक तथ्य, कैसे उत्पन हुई मां ज्वाला जी, इतिहास
ज्वालामुखी अनादि काल से एक महान तीर्थस्थल रहा है। मुगल सम्राट अकबर ने एक बार ज्वालाओं को लोहे के चक्र से ढककर और यहाँ तक कि उन तक जल पहुँचाकर बुझाने का प्रयास किया था। लेकिन ज्वालाओं ने उनके सभी प्रयासों को नष्ट कर दिया। तब अकबर ने मंदिर में एक स्वर्ण छत्र (छत्तर) भेंट किया।
ज्वालादेवी मंदिर से संबंधित एक धार्मिक कथा के अनुसार, भक्त गोरखनाथ यहां माता की आराधना किया करते थे। वह माता के परम भक्त थे और पूरी सच्ची श्रद्धा के साथ उनकी उपासना करते थे। एक बार गोरखनाथ को भूख लगी और उसने माता से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करें, मैं भिक्षा मांगकर लाता हूं। माता ने आग जला ली।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सती का शरीर 51 भागों में विभाजित हो गया, तो उनकी जीभ ज्वालामुखी क्षेत्र में गिरी, जहाँ आज भी उसकी ज्वालाएँ दिखाई देती हैं । जीभ के साथ-साथ, सती की योगशक्ति की ज्वालाएँ भी पास ही गिरी थीं। कुछ किंवदंतियों में कहा गया है कि सती के वस्त्र भी वहीं गिरे थे।
संक्षेप में, ज्वालामुखी शंकु के आकार के पर्वत या पहाड़ियाँ हैं जो पृथ्वी की सतह में एक छिद्र के चारों ओर बनते हैं। ज्वालामुखी का निर्माण तब होता है जब मैग्मा पृथ्वी की सतह पर चढ़ता है, जिससे उसके भीतर गैस के बुलबुले जमा हो जाते हैं। यह गैस पर्वत के अंदर दबाव बढ़ाती है, जिससे वह फट जाता है।
ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवों को जाता है। इसकी गिनती माता की प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी सती की जीभ गिरी थी।